सैलानियों की कविता

पानियों और पर्वतों पर लोग
समंदर और रेगिस्तानों में लोग
पानियों को झाँक रहे हैं
पर्वतों को ताक रहे हैं
समंदर को निरख रहे हैं
रेगिस्तान से प्यार कर रहे हैं
यह तुम समझ सकते हो ।
एक रेगिस्तानी साँप है
उसे नहीं लगता है
कुछ पानियों की मछलियां है
ऐसा नहीं सोचती है
समुद्र अपने विचारों में
इसे गलत समझता है
पर्वतों को तो सच
साफ-साफ दिखता है
क्योंकि वो सबसे ऊँचा है ।
मछलियों को मङुए की
लोइयां मछुआरे डालते हैं
सैलानी तो तस्वीरें खींचता है
साँपों को चूहे तो
वही रंगों नहाई लङकी खिलायगी
जो रेगिस्तान की धुन पर
कालबेलिया नाचती है
समंदर तो अपनी लहरें
उसे ही भेजेगा
जो गजरौला पहने समुद्री हवाओं पर
मछलियां सेकती है ।
सैलानी तो अपने शरीर बच्चों को
सलीके सिखाता हुआ झिङकेगा
और उनपर नजर रखता थक जाएगा ।
इस यात्रा में वह पाँव, जीभ और पेट
लेकर आया है
उसे मङुए की लोइयां निगलती
मछलियां नहीं दिखेगी
यह कामायनी तो मछुआरे बाँचेगे
उसे साँप का सुनहरा लोचदार
नॄत्य नहीं दिखेगा
यह नाट्यशास्त्र तो कालबेलिया सिखती
बंजारन पढेगी
बाघों के पंजो की छाप की चित्रकलाएँ
उसके लिए नहीं हैं
उसे तो बिना डरे कमर पर
सीर नीचे साधे
लकङियों का बोझ तौलती
वह पहाङन निरखेगी
डूकरने की आवाज़ जिसके
खूब अँधेरे गाँव में साँझ
ढलते सुनाई पङती है
तो वह जान जाती है
किस जगह बाघ छोङकर
जाएगा अपना पंजा
हम सिर्फ थकान लेकर लौटेंगे
पानियों से ,पहाड़ों से
समंदर से,रेगिस्तानों से
हमें लिखी गई कविताओं के
बारे में कुछ भी पता नहीं चलेगा
हम बाघों की तरह प्यार करेंगे
अपनी नस्लों से
हम इस यात्रा से सिर्फ
मॄत्यु लेकर लौटने वाले हैं ।

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