‘कलम का सिपाही’

कलम के सिपाही,

कलम तो उठाओ।

बहुत बो चुके वे,

बतकही बढ़ बचाओ।

खेतों में ऊसर,

दूसर लव लगाओ।

कौन धरा था घेरा,

अंधेरा तो हटाओ।

शान्त दरवाजे हैं,

इन्हेंअ ना छटकाओ।

कठिन करम करके,

जतन कर सजोया।

भगदड़ भरम में,

बहुतों ने खोया।

दौर दैव संयोग,

दीप दान कराओ।

किरन एक निकली,

है परकाश लाओ।

अंधेरा धरा का,

मिल – जुल हटाओ।

गली-गली घर-घऱ,

बढ़ दीपक जलाओ।

जहाँ ज्योति जागे,

जगा कर दिखाओ।

अधखुली आंखें ये,

अश्रु धोकर तो आओ।

पुष्प पारजात माला,

शहीदों को चढ़ाओ।

सो सुपथ सुनहला,

हिलोल सुमति लाओ।

श्रृंगार’विकाश’वास,

शाल विजित सजाओ।

यहीं सुरवास सुरथ,

सुचित’मंगल’गीत गाओ।

कलम के सिपाही,

कलम तो उठाओ।

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