सरहद को अपनी

1-॰
सरहद को अपनी
इबादत बना दो,
कटा के सिरों को
इमारत बना दो,
बहा दो लहू
वतन के लिए,
देदो प्राणों की आहुति
चमन के लिए।

2-
मानव स्वयं ही विलुप्ति के
कगार पर खड़ा है,
भूख और बेकारी से
खुद-ब-खुद मर जाएगा,
क्यों दस ग्राम बारूद व्यर्थ
जाया कर रहे हो यार,
विनाशक परमाणु से कौन
मानवता को बचाएगा?

3-
शौक जिन्दगी का न जिन्दगी
चराग की सलामत,
आदमी को कहाँ मयस्सर
आदमियत की हालत,
उठाना मुंडेर मकां की
याद है उनको मगर,
आप ही कर रहे हैं आप
अपनी वकालत।

4-
किस्मत से अपनी
गमख्वार हो गया हूँ,
न होने से तेरे
उस पार हो गया हूँ,
निकला ही न हो सूरज
जिस आईने से कभी,
उन फ़ित्नापरस्तों का
श्रंगार हो गया हूँ।

5-
मुझे न महल न गाड़ी
न खजाने की ख्वाहिश,
तू और तेरी प्रक्रति संग
मुस्कुराने की ख्वाहिश,
इतना भी न कर सके तो
मैं भक्त तू भगवान कैसा,
मुझसे पूछ मुझे है
तुझे पा जाने की ख्वाहिश।

lekhakmukeshsharma@gmail.com/9910198419

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