स्त्री-विमर्श

1-
अनूठा है खेल तेरी
किस्मत का औरत,
आंचल में आँसू तू
अस्मत की औरत,
सजाती है आँगन
सितारों की दुनियां,
दुनियां में अपनी
विरानी है औरत।

2-
बसा करके बसी न
हँसा करके हँसी है,
जिन्दगी का अनूठा
पहलू बनी है,
जिसने भी उछाला
उछली है औरत,
ठहरी तो ठहरा
कोई पहलू बनी है।

3-
औरत न खोले जुबां
न खोले न सही मगर,
न खोले आबरु की
किताब तो ठीक है,
ढका रहता है घूंघट में
महाभारत का अंत,
न उठाए पर्दा,न कहे गैर से
इतनी है बात तो ठीक है।

4-
तराजू के पालने में
लटकी है औरत,
मंजिल से अपनी ही
भटकी है औरत,
रची है औरत ने
ब्रह्मा की धरती,
धरती पे अपनी
सिसकती है औरत।

5-
हमसे न पूछ ‘वो’
किधर जा रही थी,
जिधर न थी मंजिल
चली जा रही थी,
किसी तरह पूछ लिया
रोक करके उसे,
इंसा पे उंगली
उठाए जा रही थी।

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