छंद -हरिगीतिका ,विधाता ,घनाक्षरी

हरिगीतिका

श्री रामचंद्र कृपा करो अब भक्ति मुझको दीजिये |
दुर्बुद्धि हूँ कमबुद्धि हूँ सदबुद्धि मेरी कीजिये |
अटका हुआ भटका हुआ लटका हुआ संसार में |
झटका हुआ खटका हुआ चटका हुआ हूँ प्यार में ||

विधाता

सितारे आँख में जो थे वही शोले बनें कैसे ?
बटोही तीर्थ यात्रा के लुटेरे थे बने जैसे |
चलाये तीर नैनों के हमारे घाव है ऐसे ||
भरेंगे ना कभी भी ये न मेरे पास है पैसे ||

घनाक्षरी

प्रेमिका की प्रीति संग मिलकरके प्रेम रंग , मिलने चला प्रथम प्रेयसी मिताई थी |
रोमांच रोम रोम में अनंग ढंग व्योम में ,चाँद चाँदनीं कवँल परी कोई आई थी ||
हंसिनी की चाल ढाल लाल परी रंग लाल ,मूर्त रूप मूर्ति मुझे देख मुसुकाई थी |
बीती रात सपने में हुआ जैसे ही विहान , आँखों ने दिखाई मुझे टूटी चारपाई थी ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी

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