तकलीफ

अजीब सी शख्सियत रखते है बहुत से लोग आज के दौर में l
जीते है संग खुशियो मैं, अकेला छोड़ देते है दुखो के मोड़ पे ll

क्या कहियेगा उनके बारे में शहर मैं चर्चे है जिनके नाम के l
करते है सौदा वफ़ा का सरेआम हुस्न की दौलत के नाम पे ll

भोली सी सूरत में वो जो सयाना शातिर मुखड़ा छुपाये बैठे है l
जिक्र करते है वो बड़ी सिद्दत से जिसमे हमे दोषी बता बैठे है ll

आरजू हमे न थी उनको पाने की फिर भी उनके नाम से बदनाम थे l
हम पीते रहे अश्को को समेट कर लोगो ने कहा मेरे हाथ में जाम थे

उनकी यादो के साथ आती हर सुहानी शाम सुकून दे जाती है l
जैसे सुबह के निकले पंछियो की टोली वतन को लौट आती है ll

मेरे मिज़ाज़ में नहीं अपना गम बयां करू होगी तौहीन तेरी l
अगर तेरे वजूद का हिस्सा हूँ तो महसूस कर तकलीफ मेरी ll

————-निवातियाँ डी. के.————

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