अपना तो है ज़नाज़ा भी

1-
अपना तो है ज़नाज़ा भी
तकदीर उनकी,
निकल गया तो खुल गई
तदवीर उनकी,
ख़याल उन ख़यालातों से
तौबा न करले क्यूँ,
रखी हो जिस गर्दन
शमशीर उनकी।

2-
जिस दिन तेरी महफ़िल से
उठाया जाएगा,
उस दिन मेरा ज़नाज़ा
नज़र आएगा,
हम वो नहीं कि उठा लें
कसम ही झूठी,
तेरे घर इस रूह का
तमाशा नज़र आएगा।

3-
खाक नहीं जेब में
जुबां पे इश्क की बातें,
हो रही हैं किस तरह
खुदा जाने मुलाकातें,
वो कौन जिसके देखने से
आ जाती है रौनक,
दिन यादों में गुजरता,
रात करके मुलाकातें।

4-
और क्या-क्या इस दिल
सजाने को रख लूं,
ऐ नौहागर,या तुझे
हाल बताने को रख लूं,
मुझे क्या गम
जन्नत मिले या दोज़ख,
आग बरसने दे या माचिस
तपाने को रख लूं।

5-
ये कहाँ का इंसाफ कि
आप मुआइना करें,
निकालें जूँ सर से
जूँ को आईना करें,
बदलनी होगी हर तहरीर
इंसाफ की बेजा,
उठाईए सर ओ सामने
जूँ का सामना करें।

शब्दार्थ-
1-नौहागर/रोने वाला
2-मुआइना/निरीक्षण
lekhakmukeshsharma@gmail.com/9910198419

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