वो ख़त न जिसका

1-॰
वो ख़त न जिसका
जबाब निकले,
मयस्सर हूक ओ
आह निकले,
यूँ भी ढ़हाने से जुर्म
क्या फायदा,
क्या मालूम को
अश्के-बादशाह निकले?

2-
तेरे तल्ख रवैये से
परेशान हूँ,
वर्ना मैं भी एक
इंसान हूँ,
तूने कब समझी
जहनी हालत मेरी,
न तू देवी
न मैं भगवान हूँ।

3-
कभी तो कीजिए
बात अदब की,
निकाल रहे हो
दास्तां कब-कब की,
बने हो तुम साये
हमारी किश्ती के,
और बनाते हो बातें
बेसबब की।

4-
हाल बीमार का
अच्छा न था लेकिन,
जो दी तवज्जो
बयां उसका न हुआ,
खुदा था क्रष्ण ओ राधा
जहाँ की रानी,
क्या हाल बेमजा
उस खुदा का न हुआ?

5-
आईना जिन्दगी का
बना लो हमको,
मयकदों की तरह
सजा लो हमको,
कब बदले तकदीर
ये करवट हमारी,
बाहों में अपनी
सुला लो हमको।

शब्दार्थ-
1-मयकदे/मदिरालय

lekhakmukeshsharma@gmail.com/9910198419

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