स्त्री भृण हत्या

“उलथी घागर; दुर पिया घर; रो मत बाबुल मेरे.
सुनी सुबहा; सुनी रैना; आंगन में अब तेरे.
सात जनम के दे कर फेरे; दुर किया तु मुझको,
मिठी बेरी खट्टी होवै; याद करु जो तुझको.”

तुम मुझे कहाँ प्यार देते हो;
अच्छा हैं; जो तुम मुझे;
पेट में हीं मार देते हो.

दाई बनाकर रख दिया,
बिछाई बनाकर रख दिया,
हिंदु; मुस्लिम; सिख; ईसाई सबने मुझे,
परछाई बनाकर रख दिया,
“इंसान” जैसे मैं नही,
जब चाहे वार देते हो.
अच्छा हैं; जो तुम मुझे;
पेट में हीं मार देते हो.
तुम मुझे कहाँ प्यार देते हो.

लालन पालन मेरा दोयम,
शिक्षा दिक्षा मेरी थोथी.
मुझसे जनने वालों को हैं,
मुझसे ज्यादा प्यारी पोथी.
जानवर तक की आँखे खुल जाती हैं;
पर तुम; नैन उतार देते हो..
अच्छा हैं; जो तुम मुझे;
पेट में हीं मार देते हो.
तुम मुझे कहाँ प्यार देते हो.

दान मेरा कर देते हो,
जैसे कोई चीज हुँ मैं.
अहेसान मुझपर कर देते हो,
जैसे कोई खीज हुँ मैं.
निकाल अपने घर से तुम,
जैसे दुत्कार देते हो.
अच्छा हैं; जो तुम मुझे;
पेट में हीं मार देते हो.
तुम मुझे कहाँ प्यार देते हो.

मां; बहन; बेटी; कहे मुझको,
बेबस तुमने कर दिया.
मैं प्रकृती हुँ; पर मुझको,
बेकस तुमने कर दिया.
प्रकट तुम्हे; मैं करती हुँ;
और तुम मेरा; अस्तित्व नकार देते हो.
अच्छा हैं; जो तुम मुझे; पेट में हीं मार देते हो.
तुम मुझे कहाँ प्यार देते हो.

स्त्री-भ्रुण हत्या क्यों होती हैं,
क्योंकि; समाज ने; स्त्री को; फर्क बनाकर रख दिया.
ईसलिए; असहाय मां-बाप;
गर्भ में हीं स्त्री का गला घोंट देते हैं,
क्योंकि; समाज ने; स्त्री को; नर्क बनाकर रख दिया.
सो, “ऐ, सामाजिक प्राणीयों”, तुम कौनसा; उसे; स्वर्ग- दुलार देते हो!
अच्छा हैं; जो तुम मुझे;
पेट में हीं मार देते हो.
तुम मुझे कहाँ प्यार देते हो.

सवाल “स्त्री-भृण हत्या” का नहीं हैं,
सवाल हैं “पुरुष-साम्राज्यवाद” अथवा “स्त्री-शोषण” का;
पहले “पुरुष-साम्राज्यवाद” अथवा “स्त्री-शोषण” बंद होना चाहिये.
उससे पहले कैसे कहते हो की,
“स्त्री-भृण हत्या” बंद होनी चाहिये.
क्या तुम ईतना भी नहीं जानते;
जो नपुंसक लेक्चर देते हो!
अच्छा हैं; जो तुम मुझे; पेट में हीं मार देते हो.
तुम मुझे कहाँ प्यार देते हो.

रचनाकार/कवि~ रविपाल भारशंकर
(९८९००५९५२१)

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