समय के परिंदे

समय की टहनियों पे बैठे हैं,
कुछ परिंदे जीवन के रंग में।

वो देखो वो कोयल,
उसकी कूक में है मेरा रुदन,
मेरी माँ का वो प्यार भरा स्पर्श,
और मेरे पिता का लाड़।

वो उस चिड़िया को देखो,
उसके पर में मेरा प्रथम पग,
वो मेरी बहन का स्नेह,
वो मेरे भाई का बड़प्पन।

वो उस मैना को देखो,
न कोई घर फिर भी है मगन,
मेरा लड़कपन भी ऐसा ही,
कब और कहाँ कि न किसी को खबर।

उस हंसों के जोड़े को भी देखो,
मेरा और मेरे प्रिय का है प्रेम,
सर्वस्व न्योछावर एक दुसरे पे,
प्रेम ही मंदिर, प्रेम ही ईश्वर।

उस काग ने अपने परिश्रम से,
अर्जित की है कुछ उपलब्धियां,
कुछ दूसरो की जूठन, कुछ अपना श्रम,
वो ही है दर्शाता, मेरा अधेड़, मेरा मंथन।

अब देखो उस बूढ़े गिद्ध को,
आसमान नापा जिसके परों ने कभी,
आज निर्बल जर्जर सा, बैठा है उदास,
न कोई निश्चय, और न प्रलोभन।

समय की टहनियों पे बैठे हैं,
कुछ परिंदे जीवन के रंग में।

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