लाल कलम

“लाल कलम”

मेरा जीवन लिख रही थी लाल कलम!
लिखते-लिखते रो रही थी लाल कलम!!

पन्नों की राहों में, राही कहलाते हुए!
आंसू की बूंदें, स्याही कहलाते हुए!!

थर-थर, थर-थर कांप रही थी लाल कलम!
कांपते-कांपते रो रही थी लाल कलम!!

मेरा जीवन लिख रही थी लाल कलम!
लिखते-लिखते रो रही थी लाल कलम!!

मेरा जीवन धीरे-धीरे, लिख रही थी सहमकर!
कभी तो कह उठता, कि जरा रहम कर!!

कभी शोक कभी विलाप करती लाल कलम!
फिरभी पन्नों पर टिकी रहती लाल कलम!!

मेरा जीवन लिख रही थी लाल कलम!
लिखते-लिखते रो रही थी लाल कलम!!

रचनाकारः- नवीन कुमार “आर्यावर्ती”

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