गजल

जिन्दा हूँ इसलिए की मर नहीं सकता
जीने की कसम खाई मुकर नहीं सकता

समझाएँ किस तरह बहुत शोख है ये
आवारा दिल है कभी सुधर नहीं सकता

उनकी आँखों से पिने की बन गयी आदत
दूसरा कुछ पिए भी ये मन भर नहीं सकता

दिल पे दिमाग में उन्ही की है आशियाना
अकेले जिन्दगी अब गुजर नहीं सकता

जिंदगी के आगे पड़ी है कुँवा पीछे बड़ी खाई है
गिरा दो कही पे अब डर नहीं सकता

हरि पौडेल
नेदरल्याण्ड
२५-०७-२०१४

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