मुक्तक

खजाना आंशुओ का है समन्दर है नहीं पानी |
समंदर नापने निकली अदाओं की महारानी ||
न अश्को को कभी देखा जो भर डाले समन्दर को |
खुदा जाने वो क्यों बदली गरूरे हुस्न की रानी ||

गिनीं हमने नहीं राते जो उनकी याद में जागे |
मुहब्बत जुर्म है कैसा इसी प्रतिवाद में जागे ||
बताया क्यों नहीं हमने समझ वो क्यों नहीं पायी ?
नहीं पूरी हुई है जो उसी फ़रियाद में जागे ||

कुमुदनी की नजर में तो शशी संसार है आगे |
भ्रमर तो डूब सकता है नहीं पतवार है आगे ||
कुमुदनी जान ले ये तू न तुझको चाँद चाहेगा |
सुधाकर है फ़कत आशिक भ्रमर का प्यार है आगे ||

जो मेरे हो नही सकते उन्ही को याद करते है |
किसी पत्थर की मूरत से जो फर्जी बात करते है ||
बनीं पत्थर से मूरत है मगर दिल बन नहीं सकते |
खुदा के इस बनाये दिल को वो बर्बाद करते है ||

अहर्निश याद में उनकी जो हम मदहोश रहते है |
हमीं गिरते है चक्कर खा के सब बेहोश कहते है ||
जिगर पर जख्म उनके है कि तन को जख्म हम देते |
फुहारें खून जब बरसे मुहब्बत जोश कहते है ||

हमारे रतजगे के गीत क्या पागल तराने है ?
प्रणय आराधना में क्या हुए हम भी दिवाने है ?
तवायफ के घराने की बजी अब रागिनी दिल में |
कोई अब कुछ कहे मुझको प्रणय के गीत गाने है ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी

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