कन्या सामाजिक आवश्यकता एवं विशेषता

तू दब गई थी एक दिन, वो दिन न कभी आएगा
तू होंसलों की राह चल, हर पर्वत हिल जाएगा

अब रोकें तेरी राह जो, उसे राह से हटना होगा
हर कमजोरी को तेरी, तुझसे अब छंटना होगा
स्वछन्द होकर तुझको अब, खुल कर यूँ ही जीना है
हर एक छूटा घूँट-2, तुझे आनंद के संग पीना है
तेरी इज्जत जब बढ़ेगी, ये संसार फिर बन जाएगा

तू दब गई थी एक दिन, वो दिन न कभी आएगा
होंसलों की राह चल तू, हर पर्वत हिल जाएगा

पढ़ना तेरा ऐसा हो, तुझे ज्ञानियों का ज्ञान हो
सोच तेरी ऐसी हो, वह एकदम महान हो
तू है तो सारे घर बने हैं, बिन तेरे वीरान सब
चहल-पहल ही लुप्त होती, तू नहीं चलती है जब
तू बढ़ेगी जब भी आगे, घर भी ये बढ़ जाएगा

तू दब गई थी एक दिन, वो दिन न कभी आएगा
होंसलों की राह चल तू, हर पर्वत हिल जाएगा

तू जो बहती नदी के जैसे, ठंड़ी एक धारा है
आंचल में पलें है तेरे, समस्त विचारधारा है
यूं न तू अब है अकेली, समाज तेरे साथ है
बरसा दे तू प्यार की, बारिश़ फिर क्या बात है
जब भी तेरी सोचेगा, समाज ये उबर जाएगा

तू दब गई थी एक दिन, वो दिन न कभी आएगा
होंसलों की राह चल तू, हर पर्वत हिल जाएगा

Leave a Reply