औरत हूँ इसलिए

1-॰
औरत हूँ इसलिए मर्द का
खिलौना बन गई हूँ,
वक्त के हाथों इनका
बिछौना बन गई हूँ,
अरमान है निर्माण का
इसलिए खामोश हूँ भवानी,
रहती हूँ जमीन पर
जमीन सरीखा बन गई हूँ।

2-
खोदकर कब्र न कलेजे में
दफन करो मुझको,
आईना हूँ जिन्दगी का
न कफ़न करो मुझको,
निकलकर जुल्फ से न
सलामत जिन्दगी जूँ की रही,
बगैर जुल्फ रह सको
दफन करो मुझको।

3-
खोजता हूँ मैं अगर
मिलता सवालों में,
है आदमी गुम मगर
किन खयालों में,
ले रहा हर शय मगर
कानून की तालीम,
कर रहा बंद फिर
कानून तालों में।

4-
जल रही मेरी नफ़स
सुलग रहा आईना,
रोशन था कि नहीं
मुझसे मेरा आईना,
अब दरीचे से हवा
आती नहीं ‘मुकेश’
गर्द से घर की ढका
मुझसे मेरा आईना।

5-
साजिश कत्ल करने की
रची थी खूं के रिश्तों ने,
बचना था नहीं आसां
बचाया कुछ फ़रिश्तों ने,
अदावत क्यों न करता
ये बताओ तुम मगर मुझको,
बाजी लगा दी गैर होकर
जिन फ़रिश्तों ने।

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