वेतन

कर्मचारी हो या पदाधिकारी
सभी वेतन के उत्राधिकारी
वेतन के आस में लगे रह्ते
कर्मी निजी हो या सरकारी
पदाधिकारियो को क्या चिन्ता
कर्मचारियो की सुनो दास्ता
जिनके साथ कई लाचारी
महिने भर कर्म रत रहता
छोड निजी दुनिया दारी
दिन-रात गिनता रह्ता
कितनी लम्बी यह माह्वारी
जेब में पैसे बचे खुदरा
टुटे चप्प्लों की कील की टीस
बाकी है चार माह से दोनों
बच्चों की स्कूल की फीस
मां ने कहा सब्जियां लाने को
बाबूजी की शेष हुई दवा
चाय के लिए चीनी नहीं
और भंडार में अनाज हवा
बेटी हो चली शयानी
जमा के नाम पर कर्ज है
समाज का दस्तूर है
दहेज भुगतान_
पिता का फर्ज है

रचनाकारः नवीन कुमार “आर्यावर्ती”

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