कुछ कड़वे पल

कंकरों और पत्थरों में कब तक घसीटोगे हमें, फूट कर और टूट कर हम बिखर ही जायेंगे
वेदना कितनी घनी और शूल पथ पर है घने, देखना प्रताड़ना से तेरी राह में बिछ जायेंगे

इतने जुल्म ढ़ा लिए, जुल्म और ढ़ा रहे, जुल्म ऐसे और तो हमको जुल्म ना लगे
होश में कब तक रखोगे, होश अब है कहाँ, बेहोशी और होश में मुझे फर्क बिल्कुल ना लगे

किस किस्म के जीव हो तुम, सोच कैसी है तेरी
अब तलक थी साँस चलती, अब और साँसे न चले

टड़पा भी तो तेरे हाथों, और किससे क्या गिला
तुझको पाना देख तो ले, मुझको तुझसे क्या मिला

खिल खिला के हँसी आती, मैंने आखिर क्या किया
जिसको पाया उसको खोया, जिसको पाना न पा सका

2 Comments

  1. Sandeep Singh "Nazar" 11/09/2014
  2. अरुण अग्रवाल अरुण अग्रवाल 27/11/2014

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