ख़िजा के फूल पे आती कभी बहार नहीं

खिज़ा के फूल पे आती कभी बहार नहीं
मेरे नसीब में ऐ दोस्त, तेरा प्यार नहीं
मेरे नसीब में ऐ दोस्त, तेरा प्यार नहीं …

ना जाने प्यार में कब मैं, ज़ुबां से फिर जाऊं
मैं बनके आँसू खुद अपनी, नज़र से गीर जाऊं
तेरी क़सम है मेरा कोई, ऐतबार नहीं
मेरे नसीब में …

मैं रोज़ लब पे नई एक, आह रखता हूँ
मैं रोज़ एक नये ग़म की राह तकता हूँ
किसी खुशी का मेरे दिल को, इन्तज़ार नहीं
मेरे नसीब में …

गरीब कैसे मोहब्बत, करे अमीरों से
बिछड़ गये हैं कई रांझे, अपनी हीरों से
किसी को अपने मुक़द्दर पे, इख्तियार नहीं
मेरे नसीब में …

खिज़ा के फूल पे आती कभी बहार नहीं
मेरे नसीब में ऐ दोस्त, तेरा प्यार नहीं

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