थोड़ा सा जो रूठ गए हम

तारों से भी बेख़वर है सा
है चाँद
आज क्यों
थोड़ा सा जो रूठ गए हम तो
सर पर है आसमान
आज क्यों
भूले भूले से है शहर के लोग
खोया खोया सा है सनम
आज क्यों
आँखों में है सैलाब सा
और सुखा सुखा सा है सावन
आज क्यों
गुलसन में गुल खिले हैं
परेशान सा है गुलफाम
आज क्यों
बीती बातें सब याद हैं
भूल गया हूँ हर बात मैं
आज क्यों
खुदा चाहता आज भी उसे
मिटा गया इंसान उसकी चाहत
आज क्यों ?……………….. देशबन्धु

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