‘खून की पाती लिखूँ’

खून की पाती लिखूँ,
वा अश्रुओं की धार।
हो रहा जाने क्यों,
प्रदेश में व्यभिचार।
मौन सारी सख्सियत,
चैन का अत्याचार।
खून की पाती लिखूँ,
वा अश्रुओं की धार।

खोल खिड़की झाँकता,
बुद्धि बेग विचार।
द्वेष ईर्ष्या घर कर गई,
असत्य अशुभ विचार।
कंस भी शर्माता दिखा,
विवेक हीन व्यभिचार।
खून की पाती लिखूँ,
वा अश्रुओं की धार।

वरुण को जाने बिना,
परम જ્ઞાनी को विकार।
नौका साधन लिए बिनु,
देखते भवसागर ડपार।
अचेत चेष्टा चिंतन विहीन,
वासना पाप व्यभिचार।
खून की पाती लिखूँ,
वा अश्रुओं की धार।

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  1. अरुण अग्रवाल अरुण जी अग्रवाल 12/09/2014

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