तेरा गर साथ नहीं तो है पास कुछ भी नहीं

तेरा गर साथ नहीं तो है पास कुछ भी नहीं
सैकड़ों कारवाँ का होना साथ कुछ भी नहीं।

अनंत-शून्य का है फासला खास कुछ नहीं
खुदा! तेरे आगे ये कायनात कुछ भी नहीं।

सच कहेगा सच, सच के सिवाय औ कुछ नहीं
झूठ सुनेगा बस झूठ, उसके बाद कुछ भी नहीं।

न्याय की अवमानना अब मैं भला क्यूँकर करूँ
सजा तो खूब मिली पर था गुनाह कुछ भी नहीं।

खामोषी न खुद कहती है, न कहने देती है
सन्नाटों में खुसफुसाहट है, आवाज कुछ भी नहीं।

ए शोले! तू ऐसा न भड़क कि बचे ना कुछ भी
बची राख में होगी तेरी साख कुछ भी नहीं।

गुलाब तोड़े जाते हैं बाग में हर रोज पर
है लोगों को काँटों की परवाह कुछ भी नहीं।

कितने मासूम नासमझ होते हैं ये बुजुर्ग
दे जाते हैं सब, ले जाते हैं साथ कुछ भी नहीं।

कर आया हूँ जिन्दगी मौत के इतने करीब
अब चलने या थमने को है साँस कुछ भी नहीं।

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