खुसबु

जैसे फुलों की ख़ुशबू से सब लोगों की सांसे महकें
खुदा कुछ कर ऐसा मेरी ग़ज़ल से दिल भी महकें
जितनी भीड़ बढ़ती है लोगों की तनहाई बढ़ती है
जो जितना पढ़ा होता है उतना हीं अहंकार बढ़ती है
जिस धर्म के नाम पर लोगों ने अपनी जान तक दे दी
आज उसी के नाम पर कितने मासुमों की जान तक ले ली
जैसे आग में तपकर सोना और शुद्ध होता है
वैसे हीं मेरे ग़ज़ल की आग में तपकर मन सूरज सा चमके

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