खुदा

वैसे तो दिल किसी बात का मोहताज क्या है
अगर तुम साथ नहीं हो तो फिर साथ क्या है
जबसे तेरी झलक मिली सब ख़्वाहिश मर गई
मैं हैरान हुँ तु हीं बता तुममें ऐसी बात क्या है
बहुत सोचा बहुत समझा मगर कुछ हाथ न आया
जब वक़त हो तु हीं बता देना तेरा राज क्या है
तुने जो भी दिया वहीं बांटता जाता हुँ मैं
फिर भी कम नहीं होता ये तेरा शरारत क्या है
मैं तो औरो की तरह सजदा और इबादत नहीं की
फिर भी तु मेरे साथ है तेरा ये शराफ़त क्या है
जो भी क़रीब आया कुछ लेकर देकर चल दिया
अब तु किस आस में साथ है मेरे पास बचा क्या है
जो तेरा खेल है वो तु खेलते रहना मुझको देता मज़ा नहीं
तेरे सिवा अब जानना क्या है और समझना क्या है

————आशुताेष कुमार

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