‘उपनिषद् दर्शनम्’

જ્ઞાन के स्वरूप का प्रकाश,
‘केन’ उपनिषद् कहलाता है।
आध्यात्मिक एकता का प्रतीक,
‘ईश’ उपनिषद् पढ़ा जाता है।
गम्भीर मधुर दर्शन शिष्य से,
गुरु महिमा જ્ઞાत જ્ઞાन कराता,
और वह कहलवाया करता सदा,
‘कठोपनिषद्’ हम ही वह हैं।
गुरु-ॠषि पिप्लाद के समाधानो,
का समावेश प्रश्नोपनिषद् होता है।
भव्य दर्श का જ્ઞાन सજ્ઞાन मान,
सद् उपनिषद् ‘मुंण्डक’ कराता है।
‘माण्डूक्य’उपनिषद् कहता सदा,
जन-जन सुन”यह आत्मा व्रह्म है।”
व्रह्मજ્ઞાनी परमतत्व किसे कहते सुन,
उसको ही’तैत्रिरीय उपनिषद् कहते हैं।
‘ऐतरेय उपनिषद्’ कहते हैं उसे,
जो प्रજ્ઞાन व्रह्म-व्रह्मप्रજ્ઞાन स्वरूप है।
सनत्कुमार प्रजापति आध्यात्मिकगुरु,
का उपनिषद् पाथेय જ્ઞાन कराता है।
व्रह्म में एकात्मकता,मनुष्य के देवत्व,
‘अहंव्रह्मास्मि,और तत्ववेत्ववेत्ताओं,
आध्यात्मिक सद् नारियों का જ્ઞાन,
देता वह’बृहदारण्यपउनिषद्’कहलाता है।
सत्यकाम श्र्वेतकेतु नारद सत्यानवेषक,
“तत्व त्वम् असि” वह तुम है छान्दोग्य।
अरण्य वृहद जैसा वन,शक्ति शक्ति की पुकार,
सुनते बारम्बार विवेकानन्द जी उपनिषद् मेंं।
शासीरिक मानसिक आध्यात्मिक स्वतन्त्रता,
तीनो नारे हैं उपनिषदों के उपनिषदों के सारे हैं।(अજ્ઞાन से ख्याति की ओर उप0का संदेश से)
मनुष्य के भीतर जीवन के जगत में खोज करते,
आध्यात्मिक सूક્ષ્म दृष्टि से उपनिषद् हैं सभी।।(उपनिषदों में क्या है पृ0-5)

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