विदाई

पहले तो अपना कहा,
फिर प्यार का सपना दिया,
अब दर्द का चिराग क्यों जलाते हो
और गम का दामन क्यों थमाते हो,
पहले तो अपना कहा……….
अश्क फिसलते हैं आरजू लेकर
प्रेम का दीपक जलाते हो,प्रियतम के पथ पर,
तब लौ के तपीश से क्यों बचाते थे,
और अब प्यार का दामन क्यों छुराते हो,
पहले तो अपना कहा………………
अरमानों का पहार,सर पर परा,
अनजानों के भीर मे खरा,
तब थाम हाथों को,उन जख्मो को यौ,
खुशयौ का फूल खिलाया था,
फिर आज उसी दरिया मे क्यों,
अपनों को छोर के जाते हो,
पहले क्यों अपना कहा..?
तब अपनापण का एहसास हुआ,
तो वक्त का बरा मजाक हुआ,
आप यू ह़ी भुला कर जाओगे,
रिश्तो का अस्तित्व मिटाओगे,
हे अर्ज करूं, पूज्यवर प्यारे……….
रिश्तो का धर्म निभायेंग
काटों के कुर्रू मजाक को हम ;
फूल से नहलायेंगे
मानव का अस्तित्व बचायेंगे,
एक सभ्य समाज बनायेंगे||||||

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