क्या ही ऐसा

क्या ही ऐसा होता की
तकिया जुदा कर पाता हमें
ये तो तेरी बेरुखी थी
जो दिवार बनकर मीलों के
फासले पर ले गयी हमें
कैसे भूल सकता हूँ में
की तकिया कभी था ही नहीं
ये तो मेरी बाहें थी जो
सकूँ देती थी तुझे
कैसे मान लूँ मैं
तेरे सपनों में मेरे रंग नहीं
रंगो की इस दुनिया में
कैसे बेरंग हूँ मैं ……………