अंतर्दवंद

अंतर्दवंद

आज बहुत बेचैन है, ये मेरा मन बेचारा
सोचता है क्या वो पल फिर आयेगा दोबारा ?
कल जब एक भिक्षुक हाथ फैलाये मेरे सामने आया
मुझे व्यवसायिकता की बू आयी, और मैंने उसे दुत्कारा,
पर आज मैं सोचता हूँ, वो सचमुच कोई मजबूर हो,
और नहीं कोई दूसरा, वो “निराला” का भिक्षुक हो,
द्वंद में फंसा रह जाता हूं
जब एक भिक्षुक का हाथ सामने आता है,
एक बार तो जेब में हाथ जाती है
पर अगले ही पल व्यवसायिकता भी नज़र आता है,
कुछ समझ में नहीं आता
क्या निर्णय करूं ?
अपराध को बढावा दूं या
एक मजबूर को रोने दूं,
पर अब ये सोचता हूं
कल जब एक भिक्षुक सामने आयेगा
तो दो पैसे उसके हाथों में अवश्य दूंगा
या तो अपराधों से भरे समाज में
एक अपराध और बढ जाए,
या फिर एक मजबूर की ऑंखों में
दो बुंद आंसु कम जाए,
आज के समाज में यदि
अपराधों का बढना महत्वपूर्ण है तो,
महत्वपूर्ण है एक दर्द का भी कम होना,
अगर अपराध बूरा है तो
बूरा है एक आंख का भी नम होना ।

संतोष कुमार “मुरारी”,
राष्ट्रीय पुस्तकालय,
कोलकाता ।

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