गजल – हमारी दिलरुबा कातिल जरा उसकी मेहर देखो |

हमारी दिलरुबा कातिल जरा उसकी मेहर देखो |
कटा ककड़ी के जैसा दिल चलाई है नजर देखो ||

छलकती है दी’वानी की जवानी संगमरमर सी |
चमकती है सितारों सी सुधाकर का असर देखो ||

कवँल जैसे कपोलों की कली कोई है अलबेली |
अधर उसके गुलाबों से परिस्तानी हुनर देखो ||

भ्रमर से केश उसके मुस्कुराती फुलझरी जैसी |
अदाओं की महारानी उगलती है जहर देखो ||

बिछाती है गुलों को वो डगर पर तो मुसाफिर की |
गुलों में खार रखती है रकीबों का कहर देखो ||

सितमगर प्यार की वो है जहन्नुम को दिखाती है |
मिटाती इश्क की दुनिया बनी जैसे ग़दर देखो |

उसी को नाम क्या दें हम हटी है जो नहीं दिल से ?
गजनबी सा कहर उसका सिकंदर की लहर देखो ||

भुलाने में उसे शिव को लगेगा अब समय कितना ?
कहीं ऐसा न हो जाए निकल जाए उमर देखो ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी

2 Comments

  1. Sandeep Singh "Nazar" 05/09/2014

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