व्यथा

अकेलापन दौड़ता है काटने, भाय ने आकार घेरा है,
घबराहट सी मची है दिल में, डाला निराशा ने डेरा है,
क्यों ? जीवन की अरुणाई में, यह कालीमा छाई है,
जीवन की भोर में जाने क्यों ये घटा घिर आई है।
मस्त कहाने वाला यौवन वार्धक्य-सा बोझिल है,
तरुणाई की अरुणाई में चंचलता चित्त से औझल है।
कहने को है सयानापन, पर गांभीर्य मन पर हावी है,
मन की अल्हड़ता छोड़ उदासी जाने क्यों मन भायी है।
आया कहाँ अभी तक, सतरंगी सपनीला कल,
कुछ कर गुजरने का मौका, जोश दिखने का वो पल।
दो हाथ अभी तक किए नहीं, पहले ही शस्त्र टूट गए,
जिन्होने किया प्रेरित रण को, वो सम्बल पीछे छूट गए।
अब खड़ा निःशस्त्र हूँ रण में, मैं हार नहीं यूं मानूँगा,
ठोक ताल पछाड़ूँ इस भय को, उदासी चीर मैं डालूँगा।
दे पटखनी सबको मैं, अंत श्री को वरणूगा,
देखूँ तो कुमार इस जग का दम, मैं अपने मनस से तोलूंगा,
मिल जाएगी मंजिल जिस दिन, उसी दिन मैं बोलूँगा।।

मनोज चारण
मो. 9414582964

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