कवयित्री और बाजार

नारी-संदर्भ से अलग
एक कविता
भिन्न-भिन्न अनुच्छेद
पैराग्राफ में अंकित
उसका दर्द,
प्रमाणिकता से परे
उठाता भी है
कराहता भी
पर नहीं करता कोई
उसके अन्त का उल्लेख।
जो भयावह
काली अमावस के
अंधेरे में
भटक रही है।
जिसके पास है
हजारों,करोड़ों वर्ष पुराना
विशालकाय संग्रहालय
सुरक्षित,सुसज्जित बोल
हस्तलिखित पाण्डुलिपि
नगण्य कविताएँ।
पहचान के इंतजार में
कवयित्री के बोल
बाजार में छाए हैं
कवयित्री को
बाजार बनाए हैं।

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