अपनो से फुर्सत नहीं

अपनों से फुर्सत नहीं हमको, हम गैरों से क्या बात करें,
जो समय नहीं अपनों के लिए क्यों गैरों पर बर्बाद करें,
ये माना ये मानव रीत नहीं की आप-आप ही चरे,
पर जो बात नहीं करते हमसे, हम क्यों उनकी परवाह करें।।

कल तक जिनको समझा अपना, वो गैर तो आखिर गैर रहे,
हम ही थे एक पागल जो उनको अपना कहते रहे,
अपनों की परीक्षा तब होती जब कोई विप्पत्ति आन परे,
गैरों के लिए आखिर हम क्यों अपनों से ही बैर धरें,
अपनों से फुर्सत नहीं हमको, हम गैरों से क्या बात करें।।

ये गैर कभी तो गैर न थे, थे अपनों से ज्यादा अपने,
संग इनके मिलकर देखे हमने कई हसीन-रंगीन सपने,
पर यथार्थ की धारा पर पाँव धरा तो देखा इनको दूर खड़े,
सोचा क्या ये वो है जो अपने होने का दंभ भरते थे रोज खड़े,
अपनों से फुर्सत नहीं हमको, हम गैरों से क्या बात करें।।

इस अपने-पराए चक्कर में हम पागल से तो हो ही गए,
गैर कहें है कौन अपना ?ये फर्क करना हम भूल गए,
अब हाय ज़िंदगी भी हमसे गैर बनकर है बैर करे,
अब नहीं है कोई गोद जिसे कह अपना ये शीश धरें,
अपनों से फुर्सत नहीं हमको, हम गैरों से क्या बात करें।।

मनोज चारण
मो. 9414582964

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