ईद के दिन

अजब-हिज़ार है खुदा का
कि ईद के दिन,
बख्शता है जन्नत बकरों को
कि ईद के दिन।

खुशनसीब हैं टोपी वाले
कहें अल्हा-अल्हा,
कहा अलविदा बकरों ने
कि ईद के दिन।

बेमेहर हैं तेरी मेहर से
मुलाजिम तेरे,
कसाई हैं तेरे बंदे खुदा
कि ईद के दिन।

कसूर कसाई का क्या
पेशा है कत्ल करना,
रखा है छुरा गर्दन पे
बेख़ोफ़ कि ईद के दिन।

क्या मालूम उनको कि
सबक इंसान का क्या है,
हो रही कत्ल आदमियत
कि ईद के दिन?

शाद है हर नाशाद जिसपे
मेहर की हमने,
लगा दामे-ईमां-ए-कफ़न
कि ईद के दिन।

हमें बख्श जन्नत बख्शे तो
अहसान हो तेरा,
रोजा है रोज-ब-रोज
इफ्तार कि ईद के दिन।

मुज्महिल हुआ हूँ मैं
क्या देखे नाला-ए-अश्क,
बदगुमाँ है बयाने-किस्मत
कि ईद के दिन।

क्या करोगे चढ़ाकर
इस शज़र पे औलाद,
रसन-ए-लफ़्ज पे लुटा है
दरीबां कि ईद के दिन।

वजह से काफ़िरों की
खुदा न आएगा’मुकेश’
हुआ निसार खंजर पे हर
इलेक्शन कि ईद के दिन।
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शब्दार्थ-
1-अजब-हिज़ार/अनोखा तरीका,
2-ईद के दिन/खुशी का दिन,
3-बेमेहर/क्रपाहीन,
4-नाला-ए-अश्क/आँसुओं का दुःख,
5-शज़र/व्रक्ष,
6-रसन-ए-लफ़्ज/शब्दजाल

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