गजल -नहीं मरहम बना कोई

नहीं मरहम बना कोई जो दिल के घाव भर डाले |
दवाई है नहीं कोई जो दिल का दर्द हर डाले ||

हजारों घाव पाकर भी नहीं है मानते आशिक |
धडाधड चल रहे मूसल वो ऊखल में है सर डाले ||

दिवानों ने आंशुओं से समंदर भर दिया पूरा |
नहीं महबूब माने तो समंदर खार कर डाले ||

प्रियतमा की नजर से ही हुए गहरे जख्म दिल पर |
भरेंगे जख्म दिल के तब प्रियतमा फिर नजर डाले ||

हुआ अहसास है मुझको कि अब हम भी दिवाने है |
इबादत की मुहब्बत की मुहब्बत ही कहर डाले ||

मुहब्बत एक तरफ़ा हो अगर तो क्या करे कोई ?
बिना रहमो करम महबूब ही दिल पर जहर डाले ||

लिखीं शिव ने हजारों शायरी फिर भी नहीं समझा |
मुहब्बत जागती क्यूँ है ये दिल पर क्यूँ असर डाले ?

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी

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