तू हिन्दू और होगा

फिर किसी खूं का
सवाल और होगा,
गर्दन मेरी होगी
खंजर और होगा।

यही होता आया
जमाने में यारब,
शमशीर वही होगी
खूं और होगा।

फिर किसी गर्दन
जिन्नाद कलम होंगे,
इंसा वही होगा
जल्लाद और होगा।

गर बाजु-ए-कातिल ने
डरना न सीखा,
अंजाम यही होगा
मंजर और होगा।

फिर कहीं जलेगी
फस्ल-ए-तमन्ना कोई,
तकरीर यही होगी
घर और होगा।

बारूद से तेरा दामन
न बचेगा यूँ भी,
हिन्दू ऊपर मुसलमां
नीचे दफन होगा।

बेटी की इस्मत कहीं
माता का दामन,
कहीं गरीब का
मातम और होगा।

मंजिले-रश्क पे
आवाज कब उठाएगा,
ये जुर्म है नादां
हादिसा और होगा।

तुमको खुदा ने दी
कुरआन किसके लिए,
जुर्म मुसलमां का
मुसलमां और होगा।

किस जबां-ए-खंजर
से कहा हिंदू तुमने,
कर्म जल्लाद का
तू हिंदू और होगा?
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शेर-

रखा हमारे हाथ पे
किसने हथेली बम्ब,
जीतने की ख्वाहिशें
ना हारने का गम?
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