अपनों की छाया से डरते

जो पीठ में खंजर घोंपे अपने उम्मीद करें क्या गैरों से,
बैसाखी लेकर चले क्या, अब लाचार हो गए पैरों से,
चीते-सी फुर्ती चली गई, पस्त हुए हौसले जो होते थे शेरों-से,
अब अपनों की छाया से डरते भय लगता है गैरों से॥

रोशनी की उम्मीद नहीं अब घिरे हैं स्याह अंधेरों से,
नागिन के दंश का ईलाज अब हम पूछते सपेरों से,
जिस यौवन पर मरते थे, अब डरते यौवन के चितेरों से,
जो पीठ में खंजर घोंपे अपने उम्मीद करें क्या गैरों से॥

मैंने एक सहारा था चाहा जो निकाले मुझे अँधियारों से,
चाहा था एक माझी ऐसा जो मुझे पार करे इन किनारों से,
नहीं चाहा मैंने तो ऐसा कोई जो फेंके मुझे अंधेरों में,
अब अपनों की छाया से डरते भय लगता है गैरों से॥

तुझमें मैंने देखा था वो, जो अब तक खोज रहा था मैं,
तुझमें वो मसीहा देखा जिसको अब तक खोज रहा था मैं,
पर तुम नहीं निकले वो, मारा मुझे तुमने वचनों के तीरोंसे,
जो पीठ में खंजर घोंपे अपने उम्मीद करें क्या गैरों से॥

मुझे तुमसे ये उम्मीद न थी, नहीं थी इसकी कोई आशा,
मेरी पीठ पीछे फेंकोगे तुम अपनी चोपड़ का पासा,
पता चला मित्रता नहीं होती, कभी जंगली सिंह-बघेरों से,
अब अपनों की छाया से डरते भय लगता है गैरों से॥

गलती जरा हमारी थी जो प्रेम किया इन गैरों से,
क्या पता था धोखा खायेंगे इन हुस्न के लुटेरों से,
जो कंधा ढूंढा सर रखने को उठेगी अर्थी उनके सहारों से,
प्रणयमाला नहीं उठती कभी अर्थी के इन कहारों से॥

मुझे क्या पता गोद जिसे कह अपना ये शीश धरा,
चैन थोड़ा महसूस किया, आराम से था श्वास भरा,
नहीं रही वो गोद जिसमें था अपना ये शीश धरा,
अब हाय तन के कपड़ों ने भी हमसे है बैर धरा॥

अब मौत आए तो दुख नहीं होगा, धोखा खाया अपनों से,
सच्चाई तो दूर रही अब डर लगता है सपनों से,
विश्वास का खून किया अपनों ने गीला करें क्या गैरों से,
अब अपनों की छाया से डरते भय लगता है गैरों से॥

मनोज चारण
मो. 9414582964

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