व्यंग रस और रिसवत

व्यंग रस और रिसवत

विधायक विद्याराम जी,पहली वार चुनाव जीते…. !
ढेर सारी मालाएँ गले में डालकर,जनता का आपार जन-समर्थन लेकर,क्षेत्र का दौड़ा करने
के लिए निकले I क्षेत्र की जनता ने, नेताजी का तहे दिल से स्वागत किया I साथ ही साथ
नगर के सब-इंस्पेक्टर की शिकायतों का,एक पुलिंदा भी नेताजी को थमा दिया I

नेताजी ! ने सभा संबोधित करते हुये कहा, “मेरे पिता तुल्य बुजुर्गो,माताओं,भाईयो एवं बहनो
आज आपने जो विस्वास, जो जिम्मेदारी, जो भरोसा मुझ पर किया है,निसंदेह मैं इसके योग्य
नहीं था I लेकिन, फिर भी आपने मुझे इस योग्य समझा I तो अब में आपको विश्वास दिलाता
हूँ, कि मैं, विद्याराम, इस जिम्मेदारी को पूर्ण निष्ठा, एवं ईमान दारी से निभाऊँगा I

जनता, ” नेताजी जिन्दावाद ……! नेताजी जिन्दावाद ……!”

नेताजी ! लंम्बी साँस लेकर कुर्ते की बाहें, ऊपर समटते हुऐ,” अब किसी गरीब की आँख से,किसी
महिला की आँख से,यहाँ तक कि क्षेत्र की अवाम के किसी भी नागरिक की आँखोँ से आंसू नहीं
वहने दूँगा I अगर एक भी आंसू गिरा,तो उसको मैं अपनी पलकों से उठा लूँगा, और उस एक आंसू
से विधानसभा का गलियारा गीला कर दूंगा, ईंट से ईंट बजा दूँगा,लेकिन आपका हक़ दिला के रहूँगा I”

जनता, -“नेताजी संघर्ष करो,हम तूम्हारे साथ हैं ………! नेताजी जिन्दावाद ……. I ”

नेताजी- ऐनक ठीक करते हुये,” भाईयो,बहनो अब यह मेरी जान, मेरी नहीं रही ! अब इस पर
तुम्हारा हक़ है, और तुम्हारे लिये मैं इसे हसते-हसते कुर्वान करदूँगा, यह मेरा आपसे वादा है !
आपने नगर के “दरोगा” के बारे में जो लिखा है,मैंने उसे पढ़ा, आपने तो आत्मा ही उड़ेल दी है
कागज़ पर, बाप रे-बाप कितने कष्ट सहे हैं आप लोगों ने, मैं आज ही इसकी जाँच करूंगा,और
उसे इसकी सज़ा जरूर मिलेगी, यह भी हमारा आपसे वादा है I धन्यवाद ”

जनता, -“नेताजी संघर्ष करो.…,हम तूम्हारे साथ हैं ………! नेताजी जिन्दावाद ……. I ”

नेताजी मंच से उतर कार में बैठे, और पलक झपकते ही कार धूल के गुबार में ओझल होगई I
दूसरे दिन नेताजी अचानक थाने पहुंचे, थानेदार अचानक नेताजी को थाने में देख सकपकाया,
तुरंत अपने आपको सम्हालते हुए, नमस्कार कर, बैठने का इसरा किया I

नेताजी कुर्सी पर बैठ ते हुये, कुर्ते की वाहें उपर समेटें हुये,नथुने फुलाते हुये बोले !

“क्यों, तुम देखने में तो बड़े इंसान नज़र आते हो,
मगर आम-आदमी को क्यों सताते हो ?”

थानेदार-मुस्कराते हुए बोला,
“नेताजी ! आम-आदमी,आदमी नहीं,सिर्फ आम है,
जिसे हम भी चूंसे,और तुम भी चूंसों !”

नेताजी -गर्म होकर,
“आम जनता का खूंन चूसंते हो.…, और आम बताते हो…..,
तुम अपने आप को खाखी ड्रेस में, क्या समझते हो….. ?”

थानेदार फ़िर से मुस्कुराया, चाय का प्याला नेताजी को थमाया,
और कान में धीरे से फूस-फसाया,
बोला,
“नेताजी ! आम जनता का ख़ून, वास्तव में ख़ून नहीं ……,शुद्ध आम का रस है.…!
मगर लगता है नेताजी ! आपका तो दिमाक ही ठस है…!
अगर आपने इसे नहीं चूंसा ……., तो,
तुम नेता नहीं कहलाओगें……! और हम थानेदार नहीं कहलायेंगे..!
वकील-वकील नहीं कहलायेंगे …! डाक्टर-डाक्टर नहीं कहलायेंगे ..!
नेताजी, जरा सोचो ! देश के सारे कारोबार ही ठप्प होजाएंगे … !
फिर आप ही बताइये नेताजी ..! हम बच्चों का पेट कैसे भर पाएंगे…!
इस लिए नेताजी ! मैं, आपसे भी कहता हूँ.…,
कि आम-आदमी के दुःख-दर्द का ख्याल छोड़कर., शुद्ध आम का ख्याल लाईये…!
और आज से ही रस चूसने मैं लगजाएये …! फिर, देखिये इसमें कितना मज़ा आता है ..!
जहन्नम में.…! ज़न्नत नज़र आता है …. !
यदि आप गांधीजी के आदर्शों पर चलते रहे I और उन्हीं की तरह, रस चूंसने से वंचित रहे…!
तो सच कह रहा हूँ, नेताजी ! एक दिन भूंखे मरजाओगे….!
घर छोड़ कर फुट-पाथ पर आजाओगे…. ! नेता गिरी से बच्चों पेट नहीं भर पाओगे…. ! ”

थानेदार की ऊँट-पटांग बातें सुन नेताजी ! पैर पटकते हुए। . , हाथ मलते हुए….,
थाने से बाहर निकलते हुए…., तेज़ आवाज़ से बोले !
“जनता की छाती पर तेरी ये दाल कब तक दलेगी…. ! और तेरी ये चूंसा-चांसी कब-तक चलेगी…. !
मैं तुझे इसका सबक सिखा के रहूँगा…. ! तुझे नॊकरी से निकलवा के रहूँगा…. !”

नेताजी को आपे से बहार देख थानेदार डर गया,
रोजी-रोटी लूटने की आसंका मात्र से ही उसका दिल हिल गया,
उसने सोचा अब काम ऐसे नहीं बनेगा,अब तो पैतरा ही बदलना पड़ेगा,
वह दौड़ कर बहार आया, हाथ जोड़कर गिड़-गिड़या,
इसारे से नेताजी को, उन्हीं की भाषा में समझाया,
थाने में लेजाकर नेताजी को अपने आसन पर बिठाया,
तुरंत दस हज़ार रुपये का लिफाफा थमाया,
लिफाफा देखते ही नेताजी मुस्कुराने लगे..!
सारी नाज़ग़ी ललचायी हुई आँखों से, बहाने लागे …!
ऊपर से सिर हिलाते हुए… , अंदर से लार टपकते हुए.…,
लिफाफे की तरफ हाथ बढ़ाते हुए.,,,,बोले !
“अरे !…अरे ! रहने दो इसकी क्या जरूरत थी,
बस ! बस !”
थानेदार बोला,
“लेलो, नेताजी ! यही तो है आम जनता का रस…!
नेताजी आश्चार्य चकित होकर…!
“अरे !…तो, तुम इसे ही रस कहते हो…!
मगर हमारे यहाँ तो इसे “रिस्वत” कहते है …! इसे लेने में बुराई भी क्या है .…?
जरा सोचो ! इसके अलावा अपनी कमाई भी क्या हैं ….?
भई, इसे तो हम भी लेते हैं ……! तभी तो हम BMW करों में सफर करते हैं.…!
इसी के सहारे हमारे बच्चे,विदेशों में पढ़ते हैं …! स्विस बैंकों में खाता रखते हैं …!
खेर ! छोडो इन बातों को, हम आप पर बेवजह गर्म हुए,
हम-तुम तो एक हैं … ! फर्क इतना हैं कि,
तुम खाखी में हो……! और हम खादी में है…!
तुम ‘रस’ चूसते हो……! हम ‘रिसवत’ लेते है…!
तुम जनता को सताते हो…! हम देश को सताते हैं…!
आज से हमारी और तुम्हारी दोस्ती रही ……!
अव हम कभी-कभी आया करेंगे……!
जनता के सामने तुम पर बड़बड़ाया करेंगे ……!
तुम चुप-चाप सांत होकर सुनते रहना ……!
लेकिन चलते समय रस और रिश्वत का मेल कराटे रहना……!
इस से हम में और आप में एकता बढ़ेगी……!
हमारा और आपका आर्थिक विकास होगा……!
रही बात जनता की तो भई वोतो चूसी है……! चूसेगी……!
और चूसती रहेगी……!
धन्यवाद
जगमोहन श्रीवास्तव
मोब:-9397190013

One Response

  1. manoj charan manoj charan 29/08/2014

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