निश्चित दूरी से देखो तो, ए सुन्दर संसार लगे….!

निश्चित दूरी से देखो तो,
ए सुन्दर संसार लगे….!
(१)
दूर न जाना पास आना,तव रिस्तों में प्यार बड़े I
निश्चित दूरी से देखो तो, ए सुन्दर संसार लगे II

चंदा में हैं दाग हजारों,
मगर दूऱ से मोहे मन I
आग उगलने वाला सूरज,
दूर से देता हैं जीवन II
यदि हम इनके पास गए तो,
फिर जीवन का अंत लगे I
दूर न जाना पास आना,तव रिस्तों में प्यार बड़े I
निश्चित दूरी से देखो तो, ए सुन्दर संसार लगे II

आसमान में लाखों तारे,
भिन्न-भिन्न दूरी पर सारे I
इन में भी अवगुण पलते है,
पास गए तो जल सकते हैं II
किन्तु धरातल से देखो तो,
ए मोती का थार लगे I
दूर न जाना पास आना,तव रिस्तों में प्यार बड़े I
निश्चित दूरी से देखो तो, ए सुन्दर संसार लगे II

भूख़ लगे तो रुखी रोटी,
देती है हमको जीवन I
बिना भूख के बिष सामान है,
राज-भोग के भी ब्यंजन II
नींद में धरती माँ का आँचल,
राज महल की सेज़ लगे I
दूर न जाना पास आना,तव रिस्तों में प्यार बड़े I
निश्चित दूरी से देखो तो, ए सुन्दर संसार लगे II

माता -पिता,पुत्र और भाई,
इन रिश्तों में जान समाई I
आँगन का हर कौना-कौन,
नारी बिना लगे है सूना II
देखो इन पर निर्भर होकर,
जीवन मनो नरक लगे I
दूर न जाना पास आना,तव रिस्तों में प्यार बड़े I
निश्चित दूरी से देखो तो, ए सुन्दर संसार लगे II

मंद पवन पर श्रष्टि निर्भर,
तूफानों से सर्व विनाश I
रिम-झिम पानी में जिंदगानी,
बदल फटे तो सत्यानाश II
प्रकृति संतुलन बना रहे तो ,
धरती हमको स्वर्ग लगे I
दूर न जाना पास आना,तव रिस्तों में प्यार बड़े I
निश्चित दूरी से देखो तो, ए सुन्दर संसार लगे II

जगमोहन श्रीवास्तव

Leave a Reply