ईमान

कुढ़ती इस जिंदगी का
अजब एक फ़साना है
वक़्त कैसा भी हो
बस आना जाना है

मसीहा हो या फिर
हो सच्चा शागिर्द
एक दिन धूल ख़ाक में
सब मिल जाना है

इतरा लो तुम बदन
और सोहरत पर
लकड़ियों को कहाँ
पहचान में आना है

पर्दों में रहकर
उतारते हो आबरू
रूह को खुश करने का
एक बहाना है

जीना है तो दौर को
मोड़ो ईमान की तरफ
बस ईमान ही इंसान
के काम आना है

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