वन्दे मातरम (4 – कतआ)

१.
वतन की बात करते जो वही हमको सिखाते हैं
किसे कहते यहाँ जीना वही हमको बताते हैं
यहाँ तो सब हमारे हैं वहां पर कौन है उनका
मिले जीवन यहाँ हमको वहां वो जां लुटाते हैं

२.
मिलें तो क्या नहीं होगा जमाने को दिखाना है
कभी आया समय यारों दिलों जां को लुटाना है
सदा आगे बढ़ेंगे हम नहीं पीछे कभी हटना
तिरंगे की कसम हमको हमें वादा निभाना है

३.
यहाँ हम मुस्कुराते हैं वहाँ वो जान देते हैं
कभी घायल कभी कुरबा वतन को मान देते हैं
कभी सोचा किसी माँ का वही तो एक बेटा था
नमन है उन शहीदों को जिन्दगी दान देते हैं

४.
तिरंगा शान है अपनी तिरंगा जान है अपनी
तिरंगा मान है अपना यही मुस्कान है अपनी
करे तौहीन जो इसकी वही दुश्मन हमारा है
तिरंगा है तभी हम हैं यही पहचान है अपनी

—वन्दे मातरम —गुरचरन मेहता ‘रजत’—-

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