अंतर्द्वंद्व

अंतर्द्वंद में घिरा हूँ किससे कहूँ मैं,
कोई नहीं है पास,
जिससे कहूँ मैं,
घिरा हूँ,
पर किससे ?
नहीं जानता, पर
फिर भी अकेला हूँ,
बिना छाँह के ठंडी धूप में,
पड़ा मिट्टी का ढेला हूँ।
उड़ना चाहता हूँ मिट्टी बनकर,
चलना राहों के संग चाहता,
दोस्ती पत्तों से हो मेरी,
छाँह नीम की मिल जाये,
भटकता है मन मेरा कि,
कोई मंजिल मिल जाये।
समझा नहीं किसी ने मुझको,
क्या ?
मैं भी किसी को समझ पाया,
दुनियाँ ने छला जी भरकर मुझको,
मैं दुनियाँ को छलता आया।
एक मित्र समूह पाया था जो,
खो चुका हूँ आज उसे भी,
शायद !
मैं ही था निर्मोही,
या,
धड़कती थी सबसे ज्यादा,
मेरे ही दिल में ममता,
कुछ भी था,
पर आज नजर धुँधलाई है,
आंखो में छायी लालिमा,
अवसादों की घिरती कालिमा,
जड़ होती भावनाएं,
दर्पण सी दिखती है मुझको,
कैसे दिखाऊँ अब तुमको।
हे धैर्य !
मेरे चूक गया तू,
छोड़ बीच मझधार गया तू,
हाथ पकड़ जो भरी थी कसमें,
सब कसमों को तोड़ गया तू,
क्यों ?
छोड़ा मुझको बीच भंवर में,
निःशस्त्र इस जग से लड़ने को,
कमजोर पड़ जाऊंगा मैं,
ओ धैर्य !
छोड़ मत तू बीच समर में।
क्या ?
इसीलिए थामा कर था,
क्या ?
छोटा ये जीवन समर था,
या खुद तू भी हार गया है,
क्या ?
कोई तुझको मार गया है,
दे,
मेरे प्रश्नो के उत्तर,
दे !
नहीं तो चिंतन ये मेरा,
चिंता बनकर उभरेगा,
चिंता और चिता में अंतर है जो,
वह बिन्दु कब तक अखरेगा।
तू ही तो था एक जिसे मैं,
अवलंब मानता था मेरा,
तू ही तो था एक जिसे मैं,
स्तम्भ मानता जीवन का,
समझा जिसको ईंट नीव की,
ईंट तो वो कचची निकली,
ये भवन तो जाने टिकेगा कैसे ?
जब नीव दगा दे निकली।
मत चूक अरे ओ धैर्य ! मेरे,
बीच भंवर मत छोड़ मुझे,
असहाय और अकेला,
समरांगण में मत छोड़ मुझे।
यार अकेला छोड़ न मुझको,
क्या ? मैं कुछ कर पाऊँगा,
छोड़ गया गर तू भी अकेला,
मैं तो जीते-जी मर जाऊंगा।।

मनोज चारण
मो. 9414582964

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