मगरमच्छ के आँशु

जब भूलना चाहू तो यह क्यों कर याद दिलाते है
क्यों झूठी सपने फिर घूम घूम कर आते है

भीड़ थी तमाशाइयों की जब बेहोस पड़ा था रास्ते पर
बेचारा कहकर चलते हुए झूठी दया दिखाते है

हालत जब थी अच्छी अपनी चारो ओर सम्बन्धी थे
मेरी हालत ने बदली करवट तो सभी आँख चुराते है

जिंदगीभर कोई नहीं आया मेरी जख्म सहलानेको
छोड़ चला दुनियाँ तो ये मगरमच्छ के आँशु बहाते है

हरि पौडेल
नेदरल्याण्ड
१३-०४-२०१४

2 Comments

  1. अरुण अग्रवाल अरुण जी अग्रवाल 28/08/2014
    • Paudel Paudel 28/08/2014

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