इन आँखों में

सुनी इन आँखों में देख्
सैलाब सा मंज़र नजर आएगा
जहाँ रहते थे तुम
वहाँ अश्कों का बाँध सा नजर आएगा
आज भी मेरी ग़ज़ल में
तुम ही होती हो
ये बात अलहदा है कि
मैँ ग़ज़ल ही अब कहाँ लिखता हूँ
हजारों सवालों की
इस उलझन को छोड़
आ फिर से
ये आसाँ सा सवाल पूछूँ
बंद ना हो जाए कहीं ये आँखें
उससे पहले
तेरे -मेरे सपनो को क्या?
फिर से मैँ तेरी नजर कर दूँ…………………….
“देशबंधु”