ग़ज़लें

(1)
नये झरने नये दरिया निकालें
मगर पहले कोई प्यासा निकालें

चढ़ आया सर पे सूरज फ़ासलों का
चलो इस धूप से साया निकालें

बिछुड़ने की ख़लिश जाती कहाँ है
तो फिर यादों से ये काँटा निकालें

ये जादू भी चला कर देखते हैं
बुराई ही से कुछ अच्छा निकालें

रफ़ू करना हुनर से चाक दामन
महब्बत का सूई-धागा निकालें

उधर इंसान भी रहते हों शायद
घने जंगल से इक रस्ता निकालें

नहीं बहते, ये आँसू जम गये हैैं
दबा है ज़ख़्म इक गहरा, निकालें

उलझने के लिए दुनिया पड़ी है
हम अपने वास्ते लमहा निकालें

(2)
उजालों से कोई साया निकालूं
समुंदर से कोई प्यासा निकालूं

मैं तपती रेत को होंठों से छू कर
ख़ुद अपनी प्यास से दरिया निकालूं

मुझे बुज़दिल समझ लेना सितमगर
जो अपनी आँख से क़तरा निकालूं

तुम्हारे साथ भी कब तक चलूंगा
नया रस्ता कोई अपना निकालूं

महब्बत की मुझे दौलत मिली है
सभी का उसमें से हिस्सा निकालूं

मेरी ख़्वाहिश कि जी लूँ जि़न्दगी भी
कभी फ़ुर्सत का इक लम्हा निकालूं

तुम्हारे चेहरे को नोंच कर मैं
तुम्हारा वास्तविक चेहरा निकालूं

(3)
ढूँढ रहा था ख़ुद को मैं तहख़ानों में
टूटे-फूटे ख़्वाब मिले सामानों में

दुनिया भर के फूलों ने महकाया है
तेरी ख़ुशबू अब भी है अरमानों में

लम्हा-लम्हा कि़स्तों में मरता जाऊँ
डूबा हूँ मैं किस-किस के एहसानों में

टकराना मेरी फि़तरत में शामिल है
कश्ती मेरी चलती है तूफ़ानों में

भीतर-भीतर आग दबाये रखता है
अश्क छुपाये रखता है मुस्कानों में

(4)

अपने सारे अश्क छुपा कर रखता है
सीने पर गोया इक पत्थर रखता है

जलना दीपक जैसा, चलना कश्ती-सा
जब देखो तूफ़ां से टक्कर रखता है

उसकी ख़्वाहिश है उसकी पहचान बने
ख़ुद को वो ख़तरे में अक्सर रखता है

हँस कर बातें करना उसकी आदत है
दुःख उसकी भी आँखों को तर रखता है

भीतर कुछ उठता है गोया कह डाले
लब पर चुप्पी रोज़ बराबर रखता है

(5)
ताज़े-ताज़े ख़्वाब सजाये रखता है
यानी इक उम्मीद जगाये रखता है

उसको छूने में अँगुलि जल जाती हैं
जाने कैसी आग दबाये रखता है

सबसे कहता फिरता है अपने दिल की
बाक़ी सबके राज़ छुपाये रखता है

अपनापन तो शामिल है उसके फ़न में
दुश्मन को भी दोस्त बनाये रखता है

उसका होना तय है, दिखना नामुुम्किन
कैसी इक दीवार उठाये रखता है

काँटों के जंगल में चलकर नंगे पाँव
वो अपना ईमान बचाये रखता है

(6)
क्यूं मेरे साथ ख़ुद को बाँटना चाहा
जिसे चाहा उसी से पूछना चाहा

मुसल्सल बारिशों से जि़न्दगी गु़ज़री
बहुत भीगा तो मैंने सूखना चाहा

मैं ख़ुद से बेख़बर बरसों रहा लेकिन
मिला जब तू तो ख़ुद को ढूँढना चाहा

कि जैसे काँपती है जल में परछाईं
तेरे ख़्वाबों ने मुझ में काँपना चाहा

धुआँ उठता रहा यादें सुलगने पर
गुज़श्ता वक़्त ने दम घोंटना चाहा

नहीं था जो कहीं, एहसास में ही था
खुली आँखों से उसको देखना चाहा

अकेला छोड़, आगे जि़न्दगी निकली
समय ने यूँ भी हमसे छूटना चाहा

(7)
अगर चाहा तुझे फिर और क्या चाहा
नहीं तो ख़ुद से भी इक फ़़ासला चाहा

ज़रा-सी आँच माँगी धूप से मैंने
कहाँ सूरज कोई जलता हुआ चाहा

नशा ग़ज़लों का कुछ ऐसा रहा तारी
न मय चाही न कोई मैक़दा चाहा

हवा में थरथराई लौ दिये की जब
इरादों ने ज़रा-सा हौसला चाहा

इजाज़त पास आने की न दे मुझको
अभी मिलकर न मैंने टूटना चाहा

कृष्ण सुकुमार

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