एक झलक

एक झलक

एक झलक जो उसको देखा,
देखता ही रह गया ।
मुख से कुछ न कह पाया,
बदहवास मैं तो रह गया ।

मुस्कान ने उसकी लूटा मुझको,
क्या मैं अपना हाल बताऊँ ।
मेरा दिल न मेरा रहा,
और क्या मैं रपट लिखाऊँ ।

आँखें थीं ऐसी नशीली,
कि मधुशाला भी फीका पड़ता ।
आँखें तो मेरी तब खुलतीं,
जब उसने पिलाना छोड़ा होता,

उसके केशुओं के आँचल में,
ऐसा मैं तो घिर गया ।
आँखें खुलते खुलते रह गयीं,
मैं दोबारा सो गया ।

उसके रसभरे होंठों ने,
रसभरी को पीछे छोड़ दिया ।
उसके गालों की लाली ने,
संध्या को पीछे छोड़ दिया ।

उसकी वाणी की शीतलता ने,
ऐसा मुझे जमा दिया ।
बस एक झलक उसे देखा है,
दीवाना मैं तो हो गया ।

नज़रों से जब ओझल हुई,
मानो नींद से मैं टूट गया ।
लगा ऐसे विरह में उसकी
शायर मैं तो हो गया ।

देवेश दीक्षित
9582932268

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