आइए प्रकृति से सीखें

मित्रो, मेरी कवितायें मेरे गीत हैं. मैं जहां इस ब्लॉग पर अपनी कविताओं का कविता रूप प्रस्तुत करूंगा वहीं यु ट्यूब का वो लिंक भी दूंगा जहां आप उस कविता को गीत के स्वर में सुन सकते हैं. प्रस्तुत कविता को आप इस लिंक पर सुन सकते हैं:

बदली जब घुल कर बरसी
अपना अस्तित्व मिटा कर उसने
प्यासे जीवों की प्यास हरी
तपती धरती को राहत दी.

सूरज की जलती किरणों से
राही को आश्रय देने हेतु
प्रकट हुई तरु की छाया
सूरज ढलते ही लुप्त हुई.

पुष्पों की मधुर सुगंध जो फैली
दूर दूर तक बिखर गई.

पौधे की जड़ जिसने सारा
जीवन काटा
मिट्टी में दबे अँधेरे में
और बूँद बूँद पानी दे कर
पौधे को फल से लाद दिया.

इनको न चिंता शौहरत की
न पुरस्कार न वेतन की
ये तो सब प्रकृति के सेवक हैं
उसकी आज्ञा का पालन कर
अपना कर्तव्य निभाते हैं.

शायद हमको
कुछ सबक सिखाते हैं.

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