सोचता हूँ इश्क गर

1-॰
सोचता हूँ इश्क गर
होता न इस बाजार में,
तब भला गिरतीं कहाँ
आशिकोँ पे बिजलियां?

2-
मजमां लगाकर देख लो
गर यकीं न हो,
अब भी हमारी रौनकें
बर्बाद कर देंगी।

3-
करके तुम्हारी याद ओ
चूमकर रुख़सार,
वीरां हमारी जिन्दगी
हर दीद से पहले।

4-
उनकी न थी बात ये
लेकिन नपीतुली,
उस्ताद उस राज का
कोई जरूर था।

5-
ऐ इश्क तेरी याद में
हर दफा मैंने,
उठती हुई उँगलियों
का कहर देखा।

6-
उन्हें क्या गम तबाही का
नहीं जब आबरु बचनी,
करें जब इश्क की बातें
अंधेरा तब लगे बढ़ने।

7-
कर कत्ल जो चूम लूं
रुख़सार को तेरे,
पर ये बता ये ख़ता
गेसू नहीं करते।

8-
करके निकाह यूँ समझ
ये जुल्फ काबे की नहीं,
कुछ कर्म दोज़ख के रहे
या गर्दिशों की सैर।

9-
देखकर उनको कहाँ
रोया जहाँ कोई,
मरते हुए आदमी पे
क्या गजल लिखूं?

10-
गलती की जो माँग ली
मौजे-उल्फत मैंने,
दो दिन का फ़कीर
बूढ़ा हो गया लगता।

11-
तय किया मैंने सफर
लेकिन रही बंदिश,
ये तो मेरे हुजूर की
बानगी थी एक।

12-
समय के हर तरफ मैंने
उठाया नौजवां तूफां,
हमनशीं की आशिकी में
दिल गवां बैठे।

lekhakmukeshsharma@gmail.com/9910198419

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