ख़ुदा है तो नज़र आता क्यूं नहीं

शिवालों कलीसों से बाहर आता क्यूं नहीं,
गर तू हर जगह है तो कहीं नज़र आता क्यूं नहीं.
तुझ से बड़े इन ख़ुदाओं का ग़ुरुर हिलाता क्यूं नहीं,
गर तू ख़ुदा है तो नज़र आता क्यूं नहीं.
इंसानियत को इंसानियत से मिलाता क्यूं नहीं.
गर तू हर जगह है तो कहीं नज़र आता क्यूं नहीं.
मज़हब की ख़ूनी होली खेलते आकाओं को समझाता क्यूं नहीं,
गर तू ख़ुदा है तो नज़र आता क्यूं नहीं.
दबे कुचले बेबसों को उनका हक़ दिलाता क्यूं नहीं,
गर तू हर जगह है तो कहीं नज़र आता क्यूं नहीं.
तेरे लिये लहुलुहान उन वहशियों को डराता क्यूं नहीं,
गर तू ख़ुदा है तो नज़र आता क्यूं नहीं.
मेहनतकश को दो वक़्त की रोटी खिलाता क्यूं नहीं,
गर तू हर जगह है तो कहीं नज़र आता क्यूं नहीं.
धर्म की दूकानों के साहूकारों को अपने पास बुलाता क्यूं नहीं,
गर तू ख़ुदा है तो नज़र आता क्यूं नहीं.

Leave a Reply