मेरी जवानी

रौशन जवानी के हंसी-कहकहे, महफ़िलें-मस्तियां,
सिमट गये वो शामियाने, उजड़ गयी बस्तियां.
जगमग- जगमग नज़ारे थे, हद में चांद-सितारे थे,
सपनों की सीढ़ी चढ़, भर लिये जेब सारे थे.
गुनगुनाती जिंदगी थी, यार-दोस्ती ही बंदगी थी,
पंखों को परवाज़ थे, तमन्नाओं के सुरीले साज़ थे.
आंगन-आंगन गीत थे, हर हसीन मनमीत थे,
अरमान यूं मचलते थे, जैसे बादलों पे चलते थे.
बेफ़िक्रियां, बेताबियां, बदमाशियाँ, बेतकल्लुफ़ियां,
हर सिम्त रौशन थे अलमस्तियों के कहकशां.
ये कहां ले आयी ज़िंदगी ज़िम्मेदारियों के जहां में,
मौजों के मेले पीछे छूटे, आ गया अब कहां मैं.

परवाज- गति, उड़ान, सिम्त- दिशा, कहकशां- आकाशगंगा

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