उजाले ही न डसते हों

1-
उजाले ही न डसते हों
गम उजालों का,
तब भला फिर दीप की
लौ पे न हो पहरा।

2-
जो महसूस किया
हाले-वतन मैंने,
रोया नहीं पर
रुआंसा था मैं।

3-
कहने को तो कह गया
मतलब न निकला कुछ,
भाव में जब मेरे
क्रोध का आवेश।

4-
खुदा की याद में जिस दिन
कोई बैठकर रोऐ,
खुलेगा द्वार मस्जिद का
इरादा तब बने मंजिल।

5-
सिर झुकाना गैर को
हो अगर आदत,
तब भला खन्जर कोई
क्यों न छुए गर्दन?

6-
एक बोसे ने बदल दी
तबीयत मेरी,
दीवाना फ़कीर बन गया
कमाल देखिए।

7-
बुत हुआ देखकर
कमसिन कली को मैं,
मर्द का दिल जवां
बन मोम पिघल गया।

8-
क्या बुरा कि सरक गया
दुपट्टा तेरा,
मेरा नसीब देखिए
गुस्ल किए हम।

9-
मिज़्गां हुईं शराब गर
मत देखिएगा हुस्न,
आशिकोँ की नब्ज ही
थमकर रह गई।

10-
क्या बिगड़ता गर देखते
पलटकर हमको,
बगैर मलहम कोई घाव
भरा नहीं करता।

11-
जुबां से फिर मुआं निकला
निगाहें इस तरह बरसीं,
जानतीं हों ज्यों हकीकत
मेरे जैसी ही।
12-
लिपटना जुल्फ तक अच्छा
नहीं गर पैर में पायल,
बजेंगे किस तरह घुंघरू
बता फिर तेरे पावों में?

lekhakmukeshsharma@gmail.com/9910198419

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