विश्वाश

विश्वाश
जब
तूतता है
बिसरता है
तब
सूख जाते है
आसू
आखो की
तूत जाते है
हौसला
और
मर जाता है
आदमी
उसका ह्रदय
उसके रास्ते
छूत जा्ती है
मन्जिले
है सवाल
क्या है आधार
हर्श का
कापता है ह्रदय
विसाद से
बार-बार
हर बार
सौ बार
जीने तक

– नवीन कुमार ”

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